नई दिल्ली (समृद्धि समाचार ब्यूरो) — मुंबई: आधुनिक डिजिटल बहीखातों और ईआरपी प्रणालियों के दौर में पारंपरिक भारतीय व्यापारिक लेखांकन प्रणाली "बही-खाता" के नैतिक सिद्धांत एक बार फिर वैश्विक अर्थशास्त्रियों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
वरिष्ठ सीए एवं वाणिज्य विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक प्रणाली में केवल लाभ-हानि का हिसाब नहीं होता था, बल्कि "धर्म-खाता" (नियमित सामाजिक दान), "गौशाला अंश", और समय पर कर्ज चुकाने की साख (Credit Credibility) को व्यापार की आत्मा माना जाता था।
- पारंपरिक साख और परस्पर विश्वास आधारित वाणिज्यिक नेटवर्क आधुनिक वित्तीय समावेशन की रीढ़ है।
- एमएसएमई और स्थानीय उद्यमों में पूंजी का निरंतर प्रवाह रोजगार सृजन और समग्र आर्थिक स्थिरता का आधार बनता है।
- डिजिटल तकनीकों और संगठित वित्तीय तंत्र के साथ मिलकर पारंपरिक व्यापारिक दक्षता वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन रही है।
- सामुदायिक साख प्रणाली और वित्तीय अनुशासन आर्थिक आत्मनिर्भरता की स्थायी धुरी हैं।
संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध पत्र के अनुसार, बिना किसी अदालती हस्तक्षेप के करोड़ों रुपये की हुंडी का केवल हस्ताक्षर पर भुनाया जाना दुनिया की सबसे मजबूत पीयर-टू-पीयर ट्रस्ट व्यवस्था थी, जिसे आज के स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट्स में शामिल करने की आवश्यकता है।